Tuesday, October 26, 2010

tell-a-tale



This post is on behalf of my daughter. Of many of the tales she spins out for me, this is the most recent and I find it very very interesting. She narrated this one, yesterday while I was bathing her.

She started, “एक Heart-महल में एक रानी अकेली रहती थी । एक दिन उसे बहुत पेट में दर्द हुआ । डॉक्टर ने कहा कि पेट में बेबी है । फिर उसका पेट काटना पड़ा...”

By then I was wondering if the neighbours (if anybody overhearing us from their respective bathrooms) would be thinking. Since we stay in flats and our bathroom songs and tales are audible to other flat inmates too, from their bathrooms, it is not impossible that we were having eager listeners. ‘दीवारों के भी कान होते हैं...!’

She continued, “ ....फिर रानी के पेट से एक बच्चा आया, फिर और एक....फिर और एक....फिर 4...फिर 5,6,7,8,9 और 10 बच्चें निकले...! पर इतने बच्चों का ख्याल रखेंगे?”

And now do not miss the ending.

“..इसीलिए तो कहते हैं एक बेबी हो....जैसे हमारी है...”




I wonder from where she got these ideas but I am sure these are her ORIGINAL words. We have not talked about any ‘two-kids family' concept nor is she advocating ‘one girl child family’. Here was my daughter, sounding like a tele-ad for ‘family planning..’, and I just found it hilarious and amazing.

If only she knew, if we could afford, we would actually have loved to have ten children, ...why not !

Monday, October 25, 2010

तोह्फ़ा



देते हैं तोहफ़े आपस में
जब भी बिछड़ते हैं लोग
तुम भी मुझे, जाने से पहले
कोई तोहफ़ा दे दो

मेरी मुट्ठियों में भरकर
ज़रा तुम्हारी कुछ सासें दे दो

कभी इसको शाखों पर बसाकर
आशियाना बना डालूँगी

कभी दिल से लगाकर अपने
धड़कन बना डालूँगी

कभी किताबों के सफ़ेद-काले पन्नों के बीच
उसको रख दूँगी

कभी कलम में डालकर
उसे तहरीर बना डालूँगी

दामन में कभी बसाकर उसे
खुशबू का नाम दूँगी

कभी सासों में घुलकर उसे
नशा बना डालूँगी

तकिए के नीचे रखकर कभी
उसको सपनों में बसायूंगी

कभे धूप बनाकर उसे
बालों में छुपा लूँगी

मखमली चादर में डालकर
उसको ओढ़ लूँगी

कभी ज़ेवर बना कर उसे
मैं पहन लूँगी

रहेगी बनकर एक हिस्सा तुम्हारी,
ये साँसें
दे दो, हाँ कुछ चन्द साँसें
उनसे ज़िन्दगी बना लूँगी

Anindita Baidya
(written on 08 Nov 1994)

Photograph source: The internet

Tuesday, October 12, 2010

'Matri roopen Samsthitha'....?????




आज दुर्गाष्टमी है
मैं बुलबुल..
दौड़ती, फिरती हूँ चाची, मामी, भाभियों के घर

कई घरों में आज कन्या पूजा रखा है
उमंगें उमड़ती है
मुझमें और मीना, रेखा, सीमा सब में

हर एक घर में
हमारी आरती उतारकर
तिलक करके
खूब भोग करा रही हैं सभी.....

कोई दे रही है हमें
कुछ शगुन के रूपए
तो कहीं पर मिल रही है
चूड़ियाँ, कपड़े या कई और तोहफे

हर साल मुझे इंतज़ार रहता है
दुर्गाष्टमी का
मैं कितनी खुश-नसीब हूँ
मैं कन्या हूँ
हमारे देश में कन्या को पूजा जाता है

आज दुर्गाष्टमी है
मैं ममता
सुबह से भूखी मैं
न सुझे कुछ मुझको

माँ ने आम के पेड़ के नीचे
बनाई थी कुछ रोटियाँ

माँ को जाना है
ईंट की भट्टी
बाबा भी जायेंगे

मैं खिला दूंगी रोटियाँ
मेरे चारों भाई-बहनों को
मैं बड़ी हूँ सबसे
मैं भूखी रह लूंगी

फिर ईँटा-भट्टी में कुछ काम भी कर लूंगी

काश दूर उन लड़किओं की तरह
मुझे भी कोई देता दुर्गाष्टमी के भोग
पर नहीं उन आराम तक फैलते नन्हे हाथ हमारे


माँ ने कहा, आज दुर्गाष्टमी है
कहीं पूजते हैं हमारी रूप को
तो कहीं ह्मारे देश में
बच्चें भूखे सो जाते हैं

आज दुर्गाष्टमी है
मेरा नाम नहीं है कोई
घर पर दादी, ताई और बुआ
कन्या भोज में लगी हैं



माँ को समय नहीं है
उनको जाना है


एक फैसला निभाने को
मुझे अपने बदन से निकाल फेकने को

उन्हें पता जो चला है

मेरी रूह एक लड़की बन कर
उनकी कोख में पल रही है


माँ की तो तीन लड़कियाँ और है
मेरी ज़रूरत कहाँ


जनेगी नहीं मेरी माँ मुझे

आज दुर्गाष्टमी है

मेरे देश में
कन्यायों की बली भी दी जाती है!

Images: From internet